कुछ कहती है ये सरिता....
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/// जगत दर्शन न्यूज
कुछ कहते हैं हिम पर्वत, कुछ नदिया कहती है,
कलकल करती नाद मनोरम,मद्धिम मद्धिम बहती है।
कुछ कहती हैं ये नदिया,
मोती झरते तुहिन शिशिर में,ठहरे नद झरने सारे,
धवल दुशाला शिखर ओढ़ते,लगते अद्भुत न्यारे,
अम्बर का आलिंगन करती,क्षितिज पार धरती है,
कुछ तो कहते हैं हिम.....!
भोर बिखरती जब रवि किरणे,तुंग चमकते कुंदन से,
हिमकण बिखरे चहूँ दिशा में,वट-वृक्षो में चंदन से,
नीलगगन को छूते हिमगिरि, छवि तन-मन हरती है,
कुछ कहते हैं..ये पर्वत....!
ठिठुर रही है प्रकृति समूची,दहक रहे हैं अलाव,
ठहर गई दुनिया घर अंदर, नदिया झील में नाव,
शीत लहर से सहमे जन-जन,ठिठुरन ही भरती है,
कुछ कहते हैं......

