अरावली की दास्तान
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अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली से होकर गुजरती है। यह लगभग 800 किलोमीटर लंबी और औसतन 50 किलोमीटर चौड़ी श्रृंखला ने हजारों वर्षों से इतिहास, संस्कृति और पर्यावरण को आकार दिया है। लेकिन आज आधुनिक विकास के दौर में अरावली संकट में है। खनन, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन ने इसकी आत्मा को खोखला कर दिया है। मेरा यह लेख अरावली की दास्तान को बयां करता है साथ ही उसके गौरवशाली अतीत से लेकर वर्तमान की पीड़ा तक जो यह बताता है कि कैसे ये पहाड़ महाभारत काल के योद्धाओं से लेकर आज के पर्यावरण योद्धाओं तक की कहानी कहते हैं। अरावली की उत्पत्ति भूवैज्ञानिक रूप से 25 करोड़ से 3.2 अरब वर्ष पुरानी है। यह दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शुमार है, जो हिमालय से कहीं पहले अस्तित्व में आई। प्रीकैंब्रियन युग में बने ये पहाड़ आज भी अपनी कठोर चट्टानों, ग्रेनाइट, ग्नाइस और स्किस्ट आदि इसके इतिहास की गवाही देते हैं। राजस्थान के उदयपुर, जयपुर, अलवर से लेकर गुजरात के साबरकांठा तक फैले अरावली ने नदियों को जन्म दिया। बनास, साबरमती, लूनी जैसी ये नदियां सूखे राजस्थान को जीवन प्रदान करती हैं। लेकिन दास्तान यहीं खत्म नहीं होती। अरावली ने राजपूत राजाओं को शरण दी, मुगलों को चुनौती दी और स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों को छिपने का आश्रय दिया।अरावली की दास्तान महाभारत से शुरू होती है। यहां अर्जुन ने द्रौपदी स्वयंवर के लिए धनुष प्राप्त किया था, ऐसा लोककथाओं में कहा जाता है। मेवाड़ के राणा कुम्भा ने अरावली की पहाड़ियों में विश्वप्रसिद्ध चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़ जैसे किले बनवाए। ये किले आज यूनेस्को विश्व धरोहर हैं। राणा प्रताप ने हल्दीघाटी युद्ध में अरावली की गोपियों में शरण ली, जहां से उन्होंने अकबर की सेना को ललकारा। अरावली ने न केवल योद्धाओं को बल दिया, बल्कि संतों को भी शरण दी। मीरा बाई ने यहां कृष्ण भक्ति गाई, जबकि नाथ संप्रदाय के योगी गुफाओं में तपस्या की। मध्यकाल में अरावली खनिजों का भंडार था। तांबा, संगमरमर और अभ्रक ने राज्यों को समृद्ध किया। लेकिन यह समृद्धि दास्तान का पहला मोड़ था। ब्रिटिश काल में खनन शुरू हुआ, जो आज के संकट की जड़ है। स्वतंत्रता के बाद नेहरू युग में औद्योगीकरण ने अरावली को निशाना बनाया। दिल्ली के पास अरावली के जंगल रिजर्व बनाए गए, लेकिन विकास की भूख ने इन्हें चबा लिया। आज अरावली न केवल इतिहास की किताब है, बल्कि जीवंत सभ्यता का प्रतीक भी है।अरावली की दास्तान प्रकृति की भी है। यहां शुष्क उपवन पाए जाते हैं, जहां बेर, खेजड़ी, धोक जैसे वृक्ष सूखे को झेलते हैं। अरावली में 800 से अधिक पादप प्रजातियां हैं, जिनमें 20 प्रतिशत दुर्लभ हैं। सरिस्का टाइगर रिजर्व और रणथंभौर नेशनल पार्क अरावली के हृदय हैं। यहां बाघ, तेंदुआ, सांभर हिरण घूमते हैं। पक्षियों की 300 से अधिक प्रजातियां – ग्रे पैरट्रोट, व्हाइट ब्रेस्टेड किंगफिशर आदि अरावली को जीवंत बनाती हैं। लेकिन यह विविधता खतरे में है। जलवायु परिवर्तन से वर्षा अनियमित हो गई है। 2023 के मानसून में राजस्थान में कम बारिश दर्ज की गई, जिससे अरावली के जलाशय सूख गए। अरावली दिल्ली का फेफड़ा है, यह वायु प्रदूषण को कम करता है। फिर भी, विकास ने इसे कुचल दिया। अरावली की दास्तान का सबसे दर्दनाक अध्याय आज का है। खनन माफिया ने पहाड़ों को चट्टानों में बदल दिया। सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले के बावजूद हरियाणा और राजस्थान में अवैध खनन जारी है। गुरुग्राम के अरावली में सैकड़ों अवैध खदानें हैं, जो प्रतिदिन हजारों टन पत्थर उड़ाती हैं। इससे मिट्टी कटाव बढ़ा और बाढ़ आई। वर्ष 2023 की गुड़गांव बाढ़ इसका उदाहरण है। शहरीकरण ने अरावली को घेर लिया। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे और गुरुग्राम के फार्महाउस ने हरित क्षेत्र निगल लिया। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की रिपोर्ट कहती है कि 1990 से 2020 तक अरावली का महत्वपूर्ण क्षेत्र खो गया। जल संकट गहरा गया, अरावली की नदियां सूखी पड़ी हैं, भूजल स्तर तेजी से नीचे चला गया। प्रदूषण से सांस रोग बढ़े, अलवर में स्थिति चिंताजनक है। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी दास्तान का क्लाइमेक्स है। 1992 की अरावली अधिसूचना ने इसे इको-सेंसिटिव जोन घोषित किया, लेकिन लागू नहीं हुआ। जलवायु परिवर्तन ने तापमान बढ़ा दिया, जिससे जंगलों में आग लग रही हैं।
अरावली की दास्तान का सबसे रोचक और संघर्षपूर्ण अध्याय कानूनी पटल पर लिखा जा रहा है। यह पर्यावरण न्याय की मिसाल है, जहां सुप्रीम कोर्ट, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) और हाईकोर्ट्स ने ऐतिहासिक फैसले सुनाए। 1985 में एमसी मेहता ने पहली पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) दायर की। एमसी मेहता बनाम भारत संघ मामले में, जिसमें अरावली में अवैध खनन पर रोक लगाने की मांग की गई। सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में अरावली संरक्षण मंडल गठित किया, लेकिन क्रियान्वयन कमजोर रहा। 2002 में टीएन गोधिन बनाम भारत संघ मामले में कोर्ट ने अरावली को 'प्राकृतिक फेफड़े' घोषित किया और खनन लीज रद्द करने के आदेश दिए। 2004 के एमसी मेहता बनाम हरियाणा राज्य में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अरावली वन संरक्षण अधिनियम 1980 (FCA) के तहत संरक्षित है, और कोई भी डायवर्जन मंत्रालय की पूर्व अनुमति के बिना अवैध है। 2009 में NGT ने हरियाणा की 135 खदानों पर रोक लगाई, लेकिन अपील में कुछ छूट मिली। 2019 का हनुमान दत्त शर्मा बनाम हरियाणा राज्य फैसला मील का पत्थर साबित हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को फटकार लगाई और पूरे अरावली को इको-सेंसिटिव एरिया (ESA) घोषित करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा, "अरावली का विनाश दिल्ली-एनसीआर के लिए घातक होगा"। 2021 में NGT ने सेव अरावली लिटिगेशन में 400 से अधिक खदानों सील करने के आदेश दिए, जिसमें पर्यावरण क्षतिपूर्ति जुर्माना लगाया। गुजरात हाईकोर्ट ने 2022 में माउंट आबू क्षेत्र में खनन प्रतिबंधित किया। जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली बैकअप ट्रस्ट बनाम हरियाणा के मामले में राजस्थान-हरियाणा सीमा पर 150 अवैध खदानों पर तत्काल रोक लगाई और सैटेलाइट इमेजरी से निगरानी का आदेश दिया। NGT ने दिसंबर 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट के सहयोग से गुरुग्राम के फार्महाउसों पर बुलडोजर कार्रवाई शुरू की। वन (संरक्षण) अधिनियम 2023 संशोधन के तहत अरावली को 'नो-गो' क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की गई। नवंबर 2025 का ऐतिहासिक फैसला (टीएन गोधिन मामला, 20 नवंबर 2025) में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली हिल्स की नई परिभाषा स्वीकार की (100 मीटर ऊंचाई से ऊपर), नए माइनिंग लीज प्रतिबंधित किए और सस्टेनेबल माइनिंग प्लान अनिवार्य किया। फिर भी चुनौतियां बरकरार हैं। खनन लॉबी सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दाखिल कर रही है। केंद्र की 2022 अरावली ग्रीन वॉल योजना को NGT ने 2025 में मॉनिटरिंग के लिए स्वीकार किया, लेकिन फंड रिलीज में देरी। स्थानीय अदालतें – जैसे अलवर जिला कोर्ट – आदिवासी समुदायों की PILs में जल संरक्षण पर जोर दे रही हैं। पर्यावरणविद जैसे संजय भगची और सेव अरावली अभियान PILs के जरिए लड़ रहे हैं। कानूनी दास्तान सिखाती है कि न्याय धीमा ही सही लेकिन अटल है, बशर्ते क्रियान्वयन मजबूत हो। अरावली केवल भूगोल नहीं, संस्कृति का प्रतीक है। राजस्थानी लोकगीतों में 'अरावली री रंगीली रंगत' गूंजती है। मकर संक्रांति पर अरावली में मेलों का आयोजन होता है। उदयपुर का पिछोला झील अरावली से पोषित है। लेकिन सांस्कृतिक क्षरण हो रहा है।
अरावली को बचाने के उपाय संभव हैं। सख्त खनन प्रतिबंध और सुप्रीम कोर्ट निर्देशों का पालन करें। दिल्ली से गुजरात तक हरित कॉरिडोर बनाएं। इको-टूरिज्म को बढ़ावा दें। जल संरक्षण – चेकडैम और वर्षा जल संचयन। जन जागरूकता और कानूनी सख्ती। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अरावली को UNESCO बायोस्फीयर रिजर्व बनाया जाए। हरियाणा के फरीदाबाद में 'अरावली फेस्टिवल' जैसे इवेंट सफल रहे। सरकार-एनजीओ मिलकर साझेदारी से कार्य करें। यदि समय रहते कदम उठाए, तो अरावली की दास्तान पुनर्जीवन हो सकेंगी । अरावली की दास्तान सिखाती है कि प्रकृति को निगलोगे, तो खुद निगल जाओगे। ये पहाड़ चुपचाप सह रहे हैं, लेकिन उनकी पुकार सुनो। भारत की धरती का ये गहना बचाओ, वरना इतिहास हमें और तुम्हें कभी भी माफ नहीं करेगा।

