राजस्थान का साहित्य : साक्षात्कार
भावना कौर से राजीव कुमार झा की बातचीत
भावना कौर: एक नारी हृदय
/// जगत दर्शन न्यूज
राजस्थान के अजमेर के निकट विजयनगर की निवासी भावना कौर की कविताओं में नारी हृदय के सहज, नैसर्गिक और प्रेमपूर्ण भावों का सुंदर स्पंदन दिखाई देता है। कविता लेखन से उनका गहरा जुड़ाव रहा है। उनकी रचनाओं में प्रेम, संवेदना, प्रकृति और मानवीय रिश्तों की सजीव अभिव्यक्ति मिलती है। प्रस्तुत है उनसे हुई संक्षिप्त बातचीत—
प्रश्न 1. प्रेम को नारी हृदय का नैसर्गिक भाव कहा जाता है। इसकी व्यापकता और शाश्वतता के रंगों में अपनी कविताओं में प्रवाहित जीवन के बारे में बताइए।
उत्तर : मेरी कविताओं में प्रेम केवल स्त्री-पुरुष का संबंध नहीं है। वह माँ की ममता, मित्रता, प्रकृति और मानवता में भी विद्यमान है। मैं प्रेम को बंधन नहीं, बल्कि मुक्ति मानती हूँ। मेरे जीवन की कविता रोज़मर्रा की साधारण बातों से निर्मित होती है—बारिश की बूंदें, चाय की चुस्की और बुजुर्गों की सीख। प्रेम शाश्वत है क्योंकि वह अपना रूप बदलता रहता है, किंतु कभी समाप्त नहीं होता।
प्रश्न 2. अपने माता-पिता, परिवार और शिक्षा के बारे में कुछ बताइए।
उत्तर : मैं अजमेर के एक मध्यमवर्गीय परिवार से हूँ। मेरे माता-पिता ने शिक्षा और संस्कारों को सदैव प्राथमिकता दी। पिताजी की पुस्तकों से मुझे पढ़ने की रुचि मिली, जबकि माताजी से भाषा की सरलता सीखी। परिवार छोटा है, किंतु उसमें परस्पर स्नेह और आत्मीयता बहुत है। मेरी प्रारंभिक शिक्षा अजमेर के एक सरकारी विद्यालय में हुई तथा मैंने हिंदी साहित्य में स्नातक किया। साहित्यिक वातावरण ने लेखन को मेरे लिए सहज और स्वाभाविक बना दिया।
प्रश्न 3. आपने किन-किन कवियों और लेखकों को पढ़ा है तथा उनकी रचनाओं का आपके व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर : मैंने महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, मीरा बाई, हरिवंश राय बच्चन और गोपालदास ‘नीरज’ को पढ़ा है। महादेवी जी की संवेदना और आध्यात्मिकता ने मुझे गहराई से प्रभावित किया। सुभद्रा जी की ओजस्वी रचनाओं से प्रेरणा और शक्ति मिली। बच्चन और नीरज की सरल तथा प्रभावी भाषा ने यह सिखाया कि गहन भावों को भी सहज शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है। इन सभी का प्रभाव मेरी कविताओं के नारी स्वर और संवेदनशील अभिव्यक्ति में दिखाई देता है।
प्रश्न 4. आजकल अधिकांश कवि सामाजिक विषयों पर लेखन को प्राथमिकता देते हैं। क्या वैयक्तिक अनुभूतियों पर भी कविता लेखन होना चाहिए?
उत्तर : सामाजिक विषयों पर लेखन अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि कविता समाज का दर्पण होती है। बेरोज़गारी, पर्यावरण, स्त्री की स्थिति जैसे मुद्दों को कविता में स्थान मिलना चाहिए ताकि समाज में चेतना का संचार हो सके।
किन्तु केवल सामाजिक विषयों से कविता पूर्ण नहीं होती। मेरा एकाकीपन, माँ की स्मृतियाँ, पिता की डाँट में छिपा स्नेह, पहली वर्षा का आनंद या पुरानी चिट्ठियों को पढ़ते समय आँखों का भर आना—ये सभी व्यक्तिगत अनुभूतियाँ कविता को जीवन प्रदान करती हैं। जब मैं अपना दुःख लिखती हूँ, तो वह अनेक लोगों का दुःख बन जाता है। समाज की बात भी तभी हृदय तक पहुँचती है, जब वह किसी एक संवेदनशील हृदय से निकलकर आती है। इसलिए वैयक्तिक अनुभूतियों का लेखन भी उतना ही आवश्यक है जितना सामाजिक सरोकारों का।
प्रश्न 5. आप अजमेर जिले की निवासी हैं। वहाँ की सभ्यता और संस्कृति के बारे में बताइए।
उत्तर : अजमेर को भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। यहाँ ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की पवित्र दरगाह और विश्वप्रसिद्ध पुष्कर स्थित ब्रह्मा मंदिर स्थित हैं। कार्तिक मास का पुष्कर मेला, ऊँटों की मंडी, लोकगीत, लोकनृत्य और कठपुतली कला यहाँ की विशिष्ट पहचान हैं। यहाँ के लोग अतिथि-सत्कार और सहिष्णुता के लिए जाने जाते हैं। राजस्थानी भाषा और घूमर नृत्य भी इस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर हैं। हिंदू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहज़ीब यहाँ के जनजीवन में सहज रूप से दिखाई देती है। इसी सांस्कृतिक वातावरण ने मुझे सहिष्णुता और मानवीय एकता का भाव दिया है, जो मेरी रचनाओं में भी अभिव्यक्त होता है।यह संस्करण साहित्यिक पत्रिका, समाचार-पत्र के साहित्य पृष्ठ या वेब पोर्टल पर प्रकाशन के लिए उपयुक्त है।

