“कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए...” जैसे पारंपरिक छठ गीतों से गूंजा छठ घाट
सारण (बिहार) संवाददाता धर्मेंद्र रस्तोगी: लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा के अंतिम दिन श्रद्धालुओं ने उदयीमान सूर्य को अर्घ्य दिया। जिसको लेकर छपरा नगर निगम क्षेत्र के विभिन्न छठ घाटों और गंगा, सरयू और गंडक नदी तट पर छठ व्रतियों के द्वारा उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया गया। इस दौरान पूरे धार्मिक अनुष्ठान के साथ पूजापाठ की गई। छठव्रती के साथ उनके परिजन भी बड़ी संख्या में विभिन्न नदी घाटों सहित तालाबों पर पहुंचे हुए थे। जहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ देखने को मिली। श्रद्धालुओं ने सुख, समृद्धि व शांति को लेकर भगवान सूर्य से प्रार्थना करने के साथ चार दिनों तक चलने वाले छठ महापर्व का आज समापन हो गया। श्रद्धालुओं के आगमन को लेकर नगर निगम के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासन और छठ व्रतियों के परिजनों द्वारा विशेष रूप से घाटों की साफ सफाई की गई थी। साथ ही चेंजिंग रूप और रोशनी की भी व्यवस्था की गई थी। वहीं जिला प्रशासन के द्वारा सुरक्षा को लेकर कड़े प्रबंध किए गए थे।
छठ पर्व के अंतिम दिन छठ व्रतियों ने उदयीमान सूर्य को दिया अर्घ्य:
जिले के विभिन्न मोहल्लों के साथ- साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी छठ व्रतियों ने अपने घरों, छतों और आसपास बनाए गए कृत्रिम छठ घाटों पर उदीयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर आस्था प्रकट की गई। बुधवार की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने और व्रतियों द्वारा पारण की रस्म पूरी करने के साथ चार दिवसीय लोक आस्था के महापर्व चैती छठ का समापन हुआ। छठ पर्व को लेकर अहले सुबह यानि ब्रह्मबेला से ही श्रद्धालुओं के घरों और छठ घाटों में उत्साह और उमंग का माहौल देखने को मिला। पूजन सामग्रियों में शामिल पारंपरिक पकवानों को शुद्ध देशी घी में तैयार कर बांस के बने डाला में सजाया गया था। छठ व्रती महिलाएं “कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय…” जैसे पारंपरिक छठ गीत गुनगुनाते हुए विभिन्न नदियों और जलाशयों के किनारे बने घाटों तथा घरों के कृत्रिम घाटों तक पहुंचीं हुई थी।

