मकर संक्रांति पर विशेष प्रस्तुति - सूर्य की दिशा और भारत की आत्मा
मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय जीवन- दर्शन का जीवंत प्रतीक: मोहिनी पाल
उस प्रातः काल आकाश में एक विशेष उजास था। शीतल वायु के स्पर्श में भी सूर्य किरणों की ऊष्मा कुछ अलग प्रतीत हो रही थी। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति स्वयं किसी परिवर्तन का संकेत दे रही हो। वह दिन मकर संक्रांति का था, जब वह पावन अवसर सूर्य अपनी दिशा बदल कर उत्तरायण होता है और भारत की संस्कृति मनुष्य को भी अपने जीवन की दिशा पर विचार करने की प्रेरणा देती है। गांव के समीप बहती गंगा का जल शांत था, लेकिन उसकी लहरों में युगों की स्मृतियां प्रवाहित हो रही थीं। तट पर एकत्र ग्रामीणों के मन में श्रद्धा, भक्ति और उल्लास का भाव था। मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय जीवन- दर्शन का जीवंत प्रतीक है।
पुराणों में कहा गया है कि जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब देवताओं का दिन आरंभ होता है। यह समय अज्ञान से ज्ञान की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होने का संदेश देता है। इसी कारण महाभारत में महावीर भीष्म पितामह ने शरशय्या पर पड़े रह कर उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी। क्योंकि वह जानते थे कि सही समय पर देह त्यागना आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाता है। उनका यह निर्णय धैर्य, धर्म और आत्मसंयम का अनुपम उदाहरण है।
सरयू तट की स्मृति करते ही रामायण का भाव स्वतः जाग उठता है। भगवान श्रीराम का जीवन स्वयं दिशा परिवर्तन की महान कथा है। राजमहल के सुख का त्याग कर वनवास स्वीकार करना, कष्टों को सहकर भी मर्यादा का पालन करना और अंततः धर्म की स्थापना करना। यह सब मानव को सिखाता है कि जीवन में परिस्थितियां बदलें, तब भी मूल्य और सिद्धांत नहीं बदलने चाहिए। मकर संक्रांति भी यही संदेश देती है कि दिशा बदलना दुर्बलता नहीं, बल्कि आत्मबोध का मार्ग है।
इसी क्रम में महाभारत का कर्मयोग स्मरण आता है। कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश—“कर्म करो, फल की चिंता मत करो”—जीवन का शाश्वत सत्य है। मकर संक्रांति पर अन्नदान, तिल- गुड़ का वितरण और सेवा कार्य इसी कर्मयोग का व्यावहारिक रूप हैं। जैसे किसान बीज बोता है और फल की प्रतीक्षा करता है, वैसे ही मनुष्य को भी सत्कर्म करते रहना चाहिए।
भक्ति की बात हो और गोस्वामी तुलसीदास का स्मरण न हो, यह संभव नहीं। तुलसीदास जी ने भक्ति को केवल पूजा- पाठ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे लोकमंगल से भी जोड़ा है।
उनकी पंक्ति—
“परहित सरिस धरम नहि भाई”
मकर संक्रांति के भाव को पूर्णता प्रदान करती है। इस दिन किया गया दान, सेवा और सहयोग समाज को जोड़ने का माध्यम बनता है।
मकर संक्रांति का पर्व स्वदेशी चेतना का भी प्रतीक है। तिल, गुड़, चावल और खिचड़ी। यह सभी धरती की देन हैं। यह पर्व सिखाता है कि आत्मनिर्भरता और स्वदेशी भावना ही भारत की वास्तविक शक्ति है। जब किसान, कारीगर और गृहिणियाँ मिलकर इस पर्व को मनाते हैं, तब राष्ट्र की आत्मा सजीव हो उठती है।
संध्या होते- होते सूर्य अस्त होने लगा, जबकि घर- घर दीप प्रज्वलित हो चुके थे। बच्चों की पतंगों में भविष्य के स्वप्न थे, बुज़ुर्गों की आंखों में अनुभव की गहराई थी और युवाओं के हृदय में नवसंकल्प का प्रकाश था। उस दिन मकर संक्रांति ने केवल ऋतु परिवर्तन नहीं किया था, बल्कि भारतीय मन को भी नई दिशा दी थी। अंधकार से प्रकाश की ओर, स्वार्थ से सेवा की ओर और निराशा से विश्वास की ओर! यही मकर संक्रांति का सच्चा संदेश है। यही भारत की आत्मा है।
प्रस्तुति: धर्मेंद्र रस्तोगी

