खत (कविता)
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सुनो ना...
कभी नौबत ही ना आई...
तुझे खत लिखने की...
तुम पहले माले पर रहतीं थीं...
और मैं निचली मंजिल पर...
मिलना जुलना होता ही था...
कभी आंगन में...
कभी छत पर...।। १ ।।
अब हम अलग अलग शहर में हैं...
अपने अपने कामों में व्यस्त हैं...
करीब ५ साल पहले मिले थे...
याद तुम्हारी बहुत आती है...
रोज ही एक बार क्यों ना हो...
तुम्हारे नाम को पुकार लेता हूं...
जानते हुए की तुम नहीं आओगी...।। २ ।।
अब मैं रिटायर हो चुका हूं...
अब तो तुम भी रिटायर हो चुकी होगी...
क्यों ना एक बार मिल लें दोनों...?
क्या हर्ज है...?
मुझे खुशी होगी तुम से मिलकर...
हैं तब तक...
एक बार मिल लेते हैं...
खत का जवाब लिखना...
खत का इंतजार करुंगा...
और...
रुबरु मुलाकात का भी...
आओगी ना...!
केवल तुम्हारा...!...।। ३ ।।
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