कर्मठ मेरा यौवन हो (कविता)
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/// जगत दर्शन न्यूज
व्योम-सा विस्तृत मन हो,
शिखर शैल-सा तन हो ।
सहज सरल जीवन हो ,
कर्मठ मेरा यौवन हो ।
गहन हो अंधकार भी ,
दुखों का हो पहाड़ भी ।
लांघ हम सागर जाए,
प्रलय चाहे आ जाए।
सहजता से हो जीना ,
गरल चाहे हो पीना ।
विपद सब छँट जाएगी।
सुखद बेला लाएगी।
ध्यान में लक्ष्य रहे बस,
विहग-खग नेत्र दिखे बस ।
मनन में मन रत होगा,
विवेका-सा व्रत होगा।
इंद्रियां भटकाएगी,
स्वप्न को धर लाएगी।
लक्ष्य से हट मत जाना,
इन्हें तुम मार भगाना।
गंग-सा अन्तरतम हो ,
नहीं विचलित यह मन हो ।
उपस्थित चाहे रन हो,
कटे चाहे गर्दन हो।
सत्य हो साथ हमारे ,
चाहे जीते या हारे।
विनय का साथ रहे बस,
हमेशा बना रहे यश।

