मिट्टी, पानी और विदाई के दिन (कविता)
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/// जगत दर्शन न्यूज
गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू होती थीं
तो लगता था जैसे ज़िंदगी ने थोड़ा सा ठहरकर साँस ले ली हो।
स्कूल के बस्ते घर के एक कोने में रख दिए जाते
और दिल बस एक ही जगह दौड़ता था—
नानी का घर।
नानी का घर एक नहीं, दो घर था।
पर जब हम सब वहाँ इकट्ठा होते,
तो वह एक ही धड़कन बन जाता।
पहला घर—
तीन कमरे, दो हॉल, एक रसोई
और बीच में एक बड़ा सा आँगन,
जहाँ सुबह की धूप उतरती
और दिन भर पानी गिरता रहता।
दूसरा घर—
दो अलग कमरे,
एक कमरा जो हॉल और रसोई से जुड़ा था,
और उसका अपना छोटा सा आँगन।
गर्मियों में ये दोनों आँगन
सिर्फ जगह नहीं रहते थे—
ये हमारा खेल का मैदान, हमारा स्कूल, हमारा सपना बन जाते थे।
सुबह-सुबह नाना
अंधेरे के साथ उठ जाते थे।
सफेद कुर्ता, कंधे पर टोकरी,
और बिना ज़्यादा बोले
फलों की मंडी निकल जाते थे।
नानी उसी समय चकला-बेलन संभाल लेती थीं।
रोटी की खुशबू से पहले
उनके कदमों की आहट आती थी।
वह पूरे घर का चक्कर लगातीं—
कौन उठा, कौन सो रहा है,
कौन बिना चप्पल भाग रहा है।
टिफ़िन तैयार होता—
गरम रोटी, सब्ज़ी
और साथ में एक दुआ।
कभी कोई मासी, कभी मामा,
तो कभी हम बच्चे ही
नाना के लिए टिफ़िन लेकर जाते।
और हमें लगता,
जैसे हम भी उनके काम का हिस्सा हैं।
नाना जब शाम को लौटते,
तो सिर्फ फल नहीं लाते थे—
वह थकान के साथ सुकून भी लाते थे।
आम, सेब, अनार…
पर सबसे ज़्यादा जो मिलता था,
वह था घर होने का एहसास।
हम बच्चों का सबसे बड़ा बैंक
कोई अलमारी नहीं थी—
नानी थीं।
उनके दुपट्टे में चिल्लर बँधा रहता।
कोई भी खाली हाथ नहीं जाता।
“तू भी ले… तू भी ले…”
पैसे कम होते थे,
पर प्यार कभी कम नहीं।
आँगन सुबह से गीला रहता।
बाल्टी, मग, पाइप—
और फिर शुरू होता
बर्फ़-पानी का हंगामा।
पैर फिसलते,
कपड़े चिपक जाते,
और हँसी रुकती ही नहीं।
कभी लोहा-लोहा,
कभी कबड्डी,
कभी खो-खो।
लिंगोरचा और छुपन-छुपाई में
पूरा घर घूम लिया जाता।
और जब थक जाते,
तो हम कज़िन घर-घर खेलते।
आँगन के एक कोने में
पुराने खिलौने रखे जाते।
प्लास्टिक की प्लेट,
छोटा सा कुकर,
टूटा हुआ कप—
सब कुछ असली लगता था।
चिप्स के पैकेट खुलते—
कुरकुरे सब्ज़ी बन जाते,
चिप्स रोटी,
और कोई एक बच्चा “अम्मी” बन जाता।
कोई “अब्बू”,
कोई “डॉक्टर”,
और कोई बिना रोल के भी
सबसे ज़्यादा बॉस होता।
“खाने के बाद दूध मिलेगा,”
“पहले हाथ धोना,”
हम वही बातें दोहराते
जो नानी रोज़ कहा करती थीं—
शायद तभी
घर-घर सबसे असली लगता था।
दोपहर में जब गर्मी तेज़ होती,
नानी कहतीं—
“बस, अब पानी बंद।”
और हम गीले कपड़ों में ही
ज़मीन पर बैठकर
सबसे ज़्यादा भूख महसूस करते।
शाम को दोनों आँगन फिर भर जाते।
बड़े लोग बातें करते,
हम खेलते,
और बीच-बीच में
किसी का रोना, किसी की हँसी
सब मिल जाता।
रात को कमरे कम पड़ जाते।
हॉल भी बिस्तर बन जाते।
कोई नानी के पास सोता,
कोई मासी के साथ।
कोई भी अकेला नहीं होता।
फिर धीरे-धीरे
वक़्त ने रंग बदलने शुरू किए।
मासियाँ और मामा
शादी की बातें करने लगे।
हम बच्चे भी बड़े होने लगे।
मेहंदी, शहनाई,
विदाई जैसे शब्द
अब समझ आने लगे।
नानी चिल्लर देते समय
थोड़ा रुक जाती हैं।
नाना फलों के साथ
थकान ज़्यादा लाने लगे हैं।
आँगन वही है,
पर आवाज़ थोड़ी कम हो गई है।
और तब समझ आता है—
बचपन सिर्फ खेल नहीं होता,
वह एक जगह होती है
जहाँ से हम धीरे-धीरे
आगे बढ़ते हैं।
आज भी जब ज़िंदगी भारी लगती है,
तो दिल वहीं लौट जाता है—
नानी के घर,
दो आँगनों के बीच,
जहाँ कुरकुरे भी खाना थे
और घर-घर भी ज़िंदगी।
और आँखें बंद करते ही
लगता है जैसे नानी अब भी कह रही हों—
“आओ बेटा… कुछ खा लो।”
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