महिषासुर की कथा-
मां दुर्गा की आस्था और आदिवासी परंपराओं के दो दृष्टिकोण
नवरात्र में देवी दुर्गा की विजय का उत्सव, तो कुछ समुदायों में महिषासुर को पूर्वज के रूप में याद करने की परंपरा; भारतीय संस्कृति में विविध मान्यताओं के सम्मान का सवाल:
✍️धर्मेंद्र रस्तोगी
पूरे देश में शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना हो रही है। पूजा पंडालों और मंदिरों में महिषासुर- मर्दिनी के स्वरूप की पूजा के साथ अधर्म पर धर्म और अन्याय पर न्याय की विजय का संदेश दिया जा रहा है। पौराणिक मान्यताओं में महिषासुर एक शक्तिशाली असुर था, जिसका वध देवी दुर्गा ने किया था। वहीं, कुछ आदिवासी समुदायों और सामाजिक समूहों में महिषासुर को पूर्वज, जननायक या सांस्कृतिक स्मृति के प्रतीक के रूप में देखने की परंपरा भी मिलती है। ये दोनों दृष्टिकोण भारतीय समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को सामने लाते हैं। महिषासुर शब्द की व्याख्या और उसके ऐतिहासिक अस्तित्व को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं। धार्मिक ग्रंथों में उसका वर्णन पौराणिक पात्र के रूप में मिलता है, जबकि कुछ आधुनिक सामाजिक व्याख्याएं उसे प्राचीन सत्ता-संघर्षों और स्थानीय समुदायों की स्मृतियों के संदर्भ में देखती हैं। इन व्याख्याओं को इतिहास का निर्विवाद तथ्य मानने के बजाय उनके धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भों में समझना अधिक उचित है।
पौराणिक मान्यता में देवी दुर्गा की विजय:
देवी भागवत और मार्कंडेय पुराण के अंतर्गत वर्णित देवी महात्म्य में महिषासुर की कथा प्रमुखता से आती है। कथा के अनुसार, महिषासुर ने अपनी शक्ति के बल पर देवताओं को पराजित कर दिया था। इसके बाद देवताओं की सम्मिलित शक्तियों से देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवी और महिषासुर के बीच लंबे युद्ध के बाद मां दुर्गा ने उसका वध किया। हिंदू धार्मिक परंपरा में यह प्रसंग शक्ति, साहस और अन्याय के अंत का प्रतीक है। नवरात्र में देवी दुर्गा की पूजा और विजयादशमी का पर्व इसी विजय की स्मृति से जुड़ा है। श्रद्धालुओं के लिए महिषासुर- मर्दिनी का स्वरूप दुष्ट शक्तियों पर विजय और धर्म की स्थापना का संदेश देता है। इस आस्था का सम्मान हिंदू धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आदिवासी दृष्टिकोण में महिषासुर की स्मृति:
दूसरी ओर, महिषासुर से जुड़ी कुछ वैकल्पिक व्याख्याएं भी प्रचलित हैं। झारखंड सहित कुछ क्षेत्रों में महिषासुर को पूर्वज या जननायक के रूप में याद करने वाले समुदाय और सामाजिक समूह मौजूद हैं। इन दृष्टिकोणों में प्रचलित पौराणिक कथा से अलग सामाजिक स्मृतियों, सांस्कृतिक पहचान और समुदायों के अपने इतिहास- बोध को महत्व दिया जाता है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सभी आदिवासी समुदाय महिषासुर को अपना नायक नहीं मानते और असुर जनजाति की पहचान को महिषासुर की पौराणिक कथा से सीधे जोड़ने के लिए पर्याप्त सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इन परंपराओं को समझते समय समुदायों की विविधता और उनके अपने विचारों का सम्मान आवश्यक है।
विविधता का सम्मान ही भारतीय संस्कृति की ताकत:
भारत की सांस्कृतिक परंपरा अनेक आस्थाओं, लोककथाओं और समुदायों की स्मृतियों से बनी है। किसी प्रसंग का धार्मिक अर्थ एक समुदाय के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, जबकि दूसरा समुदाय उसे अपनी सांस्कृतिक पहचान के नजरिये से देख सकता है। इन भिन्नताओं को समझने का अर्थ किसी एक की आस्था को कमतर आंकना नहीं है। नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना करने वालों की श्रद्धा का सम्मान करते हुए उन समुदायों की सांस्कृतिक परंपराओं को समझना भी जरूरी है, जो महिषासुर को अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। संवाद का उद्देश्य किसी पक्ष को सही या गलत ठहराना नहीं, बल्कि तथ्यों, मान्यताओं और ऐतिहासिक प्रमाणों के बीच अंतर स्पष्ट करना होना चाहिए। मां दुर्गा की विजय में विश्वास और समुदायों की सांस्कृतिक स्मृतियों का सम्मान यह दोनों के बीच संवेदनशील संवाद ही भारत की बहुलतावादी परंपरा को मजबूत कर सकता है।

