नीम के पेड़ में विराजती हैं गढ़देवी माता, दर्शन को उमड़ते हैं श्रद्धालु
मढ़ौरा की गढ़देवी मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र, प्राचीन मान्यताओं और लोककथाओं से जुड़ा है मां दुर्गा का दरबार
✍️ धर्मेंद्र रस्तोगी
छपरा, 17 अक्टूबर 2026
बिहार के सारण जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलों मीटर दूर मढ़ौरा की पहचान कभी चीनी मिलों और औद्योगिक गतिविधियों से हुआ करती थी। आज भले ही यहां की पुरानी मिलों की चिमनियां खामोश हैं, लेकिन इस ऐतिहासिक नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान अब भी कायम है। इसी पहचान का एक प्रमुख केंद्र है गढ़देवी माता का मंदिर, जहां नीम के पेड़ में विराजमान मां के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। क्योंकि यहां दर्शन- पूजन के लिए दूर- दराज से भक्त पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए माता के दरबार में मत्था टेकते हैं।
प्राचीन मान्यताओं से जुड़ा है मंदिर का इतिहास:
मढ़ौरा के एक छोर पर स्थित गढ़देवी मंदिर को स्थानीय लोग शक्ति और श्रद्धा का प्रमुख स्थल मानते हैं। मंदिर के इतिहास को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं और लोककथाएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि मां दुर्गा थावे धाम (गोपालगंज) की यात्रा के दौरान मढ़ौरा में रुकी थीं। इसी से इस स्थान की धार्मिक महत्ता जुड़ी हुई है। हालांकि, इन मान्यताओं की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध होना आवश्यक है।
सोमवार और शुक्रवार को उमड़ती है भीड़:
गढ़देवी मंदिर में सोमवार और शुक्रवार को विशेष पूजा- अर्चना की परंपरा बताई जाती है। इन दिनों श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। भक्त मां के दर्शन कर सुख-समृद्धि, शांति और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और परंपरा का प्रतीक भी है।
सती की कथा से भी जुड़ी है मान्यता:
मंदिर से जुड़ी एक प्रचलित धार्मिक कथा माता सती और भगवान शिव से संबंधित है। मान्यता के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में सती के देह त्यागने के बाद भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे थे। सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित किया। जहां-जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना मानी जाती है। स्थानीय लोककथा के अनुसार, मढ़ौरा के इस स्थान पर माता सती के पवित्र रक्त की कुछ बूंदें गिरी थीं। इसी विश्वास के कारण इस स्थल के प्रति श्रद्धालुओं की विशेष आस्था है। इस मान्यता को स्थानीय धार्मिक परंपरा के रूप में देखा जाता है।
चीनी मिल की स्थापना से भी जुड़ी है लोककथा:
मढ़ौरा कभी औद्योगिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। स्थानीय इतिहास के अनुसार, वर्ष 1904 में यहां चीनी मिल की स्थापना हुई थी। इसके अलावा मोर्टन उत्पादों और शराब से जुड़ी औद्योगिक इकाइयां भी थीं। वर्तमान में इन पुरानी मिलों की गतिविधियां बंद हो चुकी हैं। चीनी मिल के निर्माण को लेकर भी एक लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि निर्माण के दौरान माता की उपेक्षा के कारण बार-बार बाधाएं आ रही थीं। इसके बाद लोगों ने कई दिनों तक माता की पूजा-अर्चना की, जिसके पश्चात निर्माण कार्य आगे बढ़ सका। यह कथा आज भी स्थानीय जनश्रुति का हिस्सा है।
गढ़देवी और शिल्हौरी मंदिर हैं मढ़ौरा की धार्मिक पहचान:
मढ़ौरा की धार्मिक पहचान में गढ़देवी माता मंदिर के साथ शिल्हौरी स्थित शिव मंदिर का भी विशेष स्थान है। दोनों स्थलों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। औद्योगिक अतीत के लिए पहचाना जाने वाला मढ़ौरा आज भी अपने धार्मिक स्थलों, लोकविश्वासों और सांस्कृतिक विरासत के कारण लोगों को आकर्षित करता है। नीम के पेड़ में विराजमान गढ़देवी माता का दरबार इसी विरासत और जनआस्था की एक विशिष्ट पहचान है।

