श्रीराम से जुड़ी मान्यता, फिर भी बदहाल गढ़देवी मंदिर
बनियापुर में आस्था के प्राचीन केंद्र का 19 साल बाद भी नहीं हुआ कायाकल्प, पूर्व मंत्री और सांसदों के क्षेत्र में होने के बावजूद संरक्षण व सौंदर्यीकरण की पहल अधूरी:
✍️ धर्मेंद्र रस्तोगी:
जहां भगवान श्रीराम के आगमन से जुड़ी स्थानीय मान्यताएं हैं, जहां नवरात्र में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और जहां आसपास के दर्जनों गांवों के लोग मांगलिक कार्यों की शुरुआत माता के पूजन से करते हैं, वही वैष्णवी माता गढ़देवी मंदिर आज भी विकास की बाट जोह रहा है। सारण जिले के बनियापुर प्रखंड के कराह पंचायत अंतर्गत कराह और इब्राहिमपुर गांव की सीमा पर स्थित यह प्राचीन धार्मिक स्थल सरकारी उपेक्षा और अधूरी विकास योजनाओं की तस्वीर पेश कर रहा है। विडंबना यह है कि स्थानीय मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम के इस स्थल से जुड़ाव के बावजूद इसका समुचित विकास नहीं हो सका है। क्षेत्र से जुड़े पूर्व मंत्रियों, सांसदों और अन्य जनप्रतिनिधियों का ध्यान भी अब तक इस दिशा में अपेक्षित पहल के रूप में सामने नहीं आया है।
मांगलिक कार्यों से पहले माता के दरबार में हाजिरी:
गढ़देवी मंदिर आसपास के गांवों के लोगों की गहरी आस्था का प्रमुख केंद्र है। हरपुर, कराह, भूमिहारा और इब्राहिमपुर सहित आसपास के दर्जनों गांवों के लोग शादी- विवाह सहित कई अन्य प्रकार के मांगलिक कार्यों की शुरुआत माता की पूजा- अर्चना से करते हैं। नवदंपती भी विवाह के बाद माता का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। मंदिर में माता की सातों बहनों की पिंडी स्वरूप में पूजा करने की परंपरा है। शारदीय और चैत्र नवरात्र में विशेष पूजा- अर्चना होती है, जबकि कार्तिक महीने में यहां मेला भी लगता है। ऐसे में इस स्थल का धार्मिक महत्व स्थानीय जनजीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है।
श्रीराम के जनकपुर जाने से जुड़ी है मान्यता:
स्थानीय लोगों के अनुसार, भगवान श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के साथ ताड़का वध और अहिल्या उद्धार के बाद इसी मार्ग से जनकपुर गए थे। मान्यता है कि जनकपुर जाने के क्रम में उन्होंने यहां माता की पूजा- अर्चना भी की थी। स्थानीय लोग हरपुर- कराह नाम को भी इस प्राचीन मार्ग से जुड़ी मान्यता के संदर्भ में देखते हैं। एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्थल पर माता सती की नाक गिरी थी। हालांकि, इन मान्यताओं की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए प्रमाणिक शोध और पुरातात्विक अध्ययन आवश्यक है। धार्मिक आस्था के साथ जुड़ी इन परंपराओं के कारण भी स्थल के संरक्षण और व्यवस्थित विकास की मांग महत्वपूर्ण हो जाती है।
2007 में बनी चारदीवारी, फिर थम गई विकास की रफ्तार:
मंदिर परिसर के संरक्षण की दिशा में वर्ष- 2007 में पहल की गई थी। तत्कालीन कला एवं संस्कृति मंत्री जनार्दन सिंह सिग्रीवाल की पहल पर बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग की ओर से परिसर की चारदीवारी का निर्माण कराया गया था। स्थानीय लोगों के अनुसार, उस समय कला- संस्कृति और पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने भी स्थल का निरीक्षण किया था। इसे पालकालीन गढ़ से जोड़कर देखा गया तथा संरक्षण और सौंदर्यीकरण की रूपरेखा तैयार करने की बात कही गई थी। हालांकि, चारदीवारी निर्माण के बाद विकास की गति आगे नहीं बढ़ सकी। स्थानीय लोगों के सहयोग से परिसर में निर्माण कार्य शुरू हुआ, लेकिन वह भी अधूरा रह गया। समय के साथ अधूरे निर्माण की स्थिति खराब होती जा रही है।
सौंदर्यीकरण के नाम पर गड्ढे, श्रद्धालुओं को परेशानी:
स्थानीय लोगों का आरोप है कि मनरेगा के तहत सौंदर्यीकरण के नाम पर लाखों रुपए खर्च किए गए, लेकिन मंदिर परिसर में आज भी बड़े- बड़े गड्ढे बने हुए हैं। इससे श्रद्धालुओं को आवागमन में परेशानी होती है और उनके चोटिल होने का खतरा बना रहता है। नवरात्र और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। ऐसे में परिसर को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाना जरूरी है। लोगों का सवाल है कि यदि विकास के लिए राशि खर्च हुई, तो उसका अपेक्षित परिणाम परिसर में क्यों नहीं दिखाई दे रहा है? हालांकि, खर्च की गई राशि, कार्यों की स्थिति और जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित अभिलेखों की जांच जरूरी है।
जनप्रतिनिधियों की पहल का इंतजार:
स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले कई जनप्रतिनिधि मंत्री और सांसद जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। जिसमें पूर्व मंत्री उमा पाण्डेय और वैद्यनाथ पाण्डेय, पूर्व सांसद गिरजा देवी के अलावा
पूर्व मंत्री जनार्दन सिंह सिग्रीवाल जो वर्तमान में इसी संसदीय क्षेत्र से सांसद भी शामिल हैं, जो पड़ोसी गांव से संबंध रखते हैं। इसके बावजूद मंदिर के समग्र विकास, ऐतिहासिक महत्व के अध्ययन और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के विस्तार को लेकर ठोस पहल की जरूरत बनी हुई है। यह सवाल भी उठता है कि वर्षों पहले संरक्षण और सौंदर्यीकरण की जो उम्मीद जगी थी, उसे अब तक जमीन पर क्यों नहीं उतारा जा सका। हालांकि, जनप्रतिनिधियों की ओर से इस संबंध में किसी हालिया पहल या आधिकारिक प्रतिक्रिया की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
सर्वेक्षण और संरक्षण से बदल सकती है तस्वीर:
गढ़देवी मंदिर केवल पूजा- अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि स्थानीय आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जरूरत है कि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग मंदिर परिसर का सर्वेक्षण कराएं, अधूरे निर्माण और मनरेगा के तहत कराए गए कार्यों की स्थिति की जांच करें तथा ऐतिहासिक महत्व का प्रमाणिक अध्ययन कराएं। साथ ही, परिसर के गड्ढों को भरने, सुरक्षित आवागमन, साफ-सफाई और श्रद्धालुओं की बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था की जाए। इससे धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकता है। अब सवाल यही है कि वर्षों से उपेक्षा झेल रहे गढ़देवी माता मंदिर के विकास की पहल कब शुरू होगी। भगवान श्रीराम से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं और हजारों लोगों की आस्था वाले इस स्थल को आखिर कब उसका अपेक्षित सम्मान और संरक्षण मिल सकेगा।

