‘वंदे मातरम’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी: भूमि, भाषा और करुणा के संदर्भ में राष्ट्र की हुई व्यापक व्याख्या
/// जगत दर्शन न्यूज
कोलकाता, 30 अगस्त 2026
‘वंदे मातरम’ के स्थायी सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 29 और 30 अगस्त को कोलकाता में किया गया। ‘भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में वंदे मातरम की पहचान’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्वानों और साहित्यकारों ने गीत के साहित्यिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और राष्ट्रीय आयामों पर चर्चा की।
संगोष्ठी का आयोजन साहित्य अकादमी ने भारतीय संग्रहालय, पूर्वी क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र (EZCC), संस्कृत कॉलेज एवं विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन साहित्यपथ और अखिल भारतीय साहित्य परिषद के सहयोग से किया। चर्चा में वंदे मातरम के भूमि, भाषा, प्रकृति, ज्ञान और करुणा से जुड़े गहरे संबंधों को केंद्र में रखा गया।
प्रो. नंदिनी साहू ने की अंतर-अनुशासनात्मक व्याख्या
उद्घाटन सत्र में हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल की कुलपति एवं अंग्रेजी की प्रोफेसर प्रो. नंदिनी साहू मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। उन्होंने दूसरे दिन वक्ता और सत्र अध्यक्ष के रूप में भी भाग लिया।
अपने उद्घाटन भाषण में प्रो. साहू ने वंदे मातरम की अंतर-अनुशासनात्मक व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने ग्रीन कल्चरल स्टडीज, ब्लू ह्यूमैनिटीज, हिंदू स्टडीज, भारतीय ज्ञान प्रणाली, लोक साहित्य और स्मृति संस्कृति जैसे विभिन्न क्षेत्रों को वंदे मातरम की सांस्कृतिक समझ से जोड़ते हुए इसके व्यापक अर्थों पर प्रकाश डाला।
उनकी प्रस्तुति ‘वंदे मातरम: भूमि, जल, भाषा और करुणा के माध्यम से राष्ट्र की कल्पना’ विषय पर केंद्रित रही। उन्होंने कहा कि इस दृष्टिकोण से परिदृश्य पहचान, प्रकृति स्मृति, भाषा अपनेपन और करुणा सामूहिक जीवन का आधार बनती है।
देशभर के विद्वानों ने की भागीदारी
उद्घाटन समारोह में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. माधव कौशिक, सचिव डॉ. वरुण गुलाटी, डॉ. आशीष गिरी, डॉ. सायन भट्टाचार्य और डॉ. सुदीप बसु सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
डॉ. माधव कौशिक और डॉ. वरुण गुलाटी ने संगोष्ठी के राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय महत्व पर जोर दिया। उन्होंने ऐसे बौद्धिक संवादों को सकारात्मक सामाजिक बदलाव और सार्थक अकादमिक जुड़ाव के लिए महत्वपूर्ण बताया।
देशभक्ति गीत से आगे सांस्कृतिक पाठ के रूप में चर्चा
संगोष्ठी में हुई चर्चा वंदे मातरम को केवल एक देशभक्ति रचना के रूप में देखने तक सीमित नहीं रही। विद्वानों ने इसे राष्ट्र, प्रकृति, भाषा, स्मृति, पहचान और सभ्यतागत चेतना से जुड़ा एक व्यापक सांस्कृतिक पाठ बताया।
दो दिवसीय संगोष्ठी में विभिन्न राज्यों और विषयों से जुड़े विद्वानों की भागीदारी रही। संवाद के दौरान वंदे मातरम के माध्यम से राष्ट्र की कल्पना, सांस्कृतिक स्मृति और प्रकृति के साथ समाज के संबंधों जैसे विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।
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