बेटी के खोइछा में मिली कोठी आज भी संजोए है सदियों पुरानी विरासत
बेतिया राजघराने से जुड़ी लोककथा का प्रतीक गोपालगंज के गौरा गांव की ऐतिहासिक कोठी, जर्जर दीवारों में आज भी जीवंत है अतीत की कहानी
✍️ धर्मेंद्र रस्तोगी
बिहार के गोपालगंज जिले के कटेया प्रखंड अंतर्गत गौरा गांव में स्थित एक ऐतिहासिक कोठी आज भी अतीत की एक अनूठी कहानी को अपने भीतर समेटे हुए है। समय के थपेड़ों ने भले ही इसकी भव्यता को काफी हद तक प्रभावित कर दिया हो, लेकिन इसकी मौजूदगी आज भी गांव की ऐतिहासिक पहचान और स्थानीय लोकस्मृति से जुड़ी हुई है। इस कोठी के निर्माण और इसके पीछे की कहानी को लेकर पीढ़ियों से एक दिलचस्प लोककथा प्रचलित है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, सदियों पहले गौरा गांव की एक बेटी का विवाह तत्कालीन बेतिया राजघराने में हुआ था। विवाह के बाद विदाई के समय बेटी को खोइछा में धन-दौलत के साथ एक कोठी भी दी गई थी। इसी परंपरा से इस कोठी का इतिहास जुड़ा बताया जाता है। हालांकि, इस लोककथा से संबंधित ऐतिहासिक दस्तावेजों और प्रमाणों की पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन स्थानीय लोगों के बीच यह कहानी आज भी प्रचलित है।
कहा जाता है कि उस दौर में बेटी की विदाई केवल पारिवारिक रस्म नहीं, बल्कि मान-सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतीक हुआ करती थी। गौरा की इस कोठी को भी उसी परंपरा और एक बेटी के प्रति परिवार के स्नेह व सम्मान की निशानी के रूप में देखा जाता है।
कोठी की पुरानी दीवारें, मेहराबदार संरचना और पुराने दरवाजे इसके स्थापत्य की विशिष्टता को दर्शाते हैं। हालांकि, लंबे समय से उचित देखरेख के अभाव में इसकी स्थिति जर्जर होती जा रही है। यदि समय रहते इसके संरक्षण की पहल नहीं हुई तो इतिहास से जुड़ी यह महत्वपूर्ण इमारत धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो सकती है।
गौरा की यह कोठी केवल एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि स्थानीय इतिहास, पारिवारिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का माध्यम है। जरूरत है कि इसके इतिहास का दस्तावेजीकरण कराया जाए और पुरातात्विक व ऐतिहासिक महत्व की जांच के साथ इसके संरक्षण की पहल हो। क्योंकि इमारतें समय के साथ कमजोर पड़ सकती हैं, लेकिन उनसे जुड़ी यादें और कहानियां आने वाली पीढ़ियों के लिए अनमोल धरोहर होती हैं।

