हार के बाद शिक्षकों की निष्ठा पर सवाल उठाना कितना उचित?
सारण शिक्षक निर्वाचन परिणाम पर बहस- मतदाताओं की स्वतंत्र पसंद का सम्मान हो, बिना प्रमाण पूरे शिक्षक समुदाय पर आरोप लगाना लोकतांत्रिक मर्यादा के विरुद्ध
✍️ कुमार मृणाभ | संपादन: धर्मेंद रस्तोगी
बिहार विधान परिषद के सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव परिणाम ने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। निर्दलीय प्रत्याशी की जीत के बाद शिक्षकों पर पैसे लेकर मतदान करने जैसे आरोप लगाए जाने की खबरें सामने आई हैं। यदि ऐसे आरोप बिना किसी ठोस प्रमाण के लगाए जा रहे हैं, तो यह न केवल लोकतांत्रिक मर्यादा, बल्कि शिक्षक समुदाय के सम्मान और गरिमा से जुड़ा गंभीर सवाल है। लोकतंत्र में चुनाव परिणाम किसी दल, प्रत्याशी या राजनीतिक समीकरण की अपेक्षाओं के अनुसार नहीं, बल्कि मतदाताओं की पसंद के आधार पर तय होते हैं। जब परिणाम अनुकूल आते हैं, तो मतदाताओं को जागरूक और विवेकशील बताया जाता है। लेकिन परिणाम विपरीत होने पर उन्हीं मतदाताओं की निष्ठा और ईमानदारी पर सवाल उठाना दोहरे मापदंड को दर्शाता है।
आरोप लगाने से पहले प्रमाण जरूरी:
शिक्षकों पर बिक जाने का आरोप लगाने वालों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनके पास इसके समर्थन में क्या ठोस प्रमाण हैं। क्या किसी जांच में धन के बदले मतदान करने की बात सामने आई है? यदि नहीं, तो ऐसे गंभीर आरोपों का आधार क्या है? चुनाव में पराजय किसी भी प्रत्याशी के लिए निराशाजनक हो सकती है, लेकिन हार को स्वीकार करने के बजाय मतदाताओं के चरित्र पर सवाल उठाना उचित नहीं है। लोकतंत्र में आलोचना और असहमति का अधिकार सभी को है, लेकिन इसके साथ तथ्यात्मक जिम्मेदारी भी जरूरी है।
शिक्षक समाज की बौद्धिक चेतना के संवाहक:
शिक्षक केवल मतदाता नहीं, बल्कि समाज की बौद्धिक चेतना के संवाहक भी हैं। क्योंकि वह विद्यार्थियों को विवेक, तर्क, नैतिकता और स्वतंत्र चिंतन की शिक्षा देते हैं। ऐसे में पूरे शिक्षक समुदाय की निर्णय क्षमता और ईमानदारी पर सवाल उठाना गंभीर विषय है। किसी प्रत्याशी को वोट देना या न देना प्रत्येक मतदाता का स्वतंत्र अधिकार है। शिक्षक किसी उम्मीदवार के विचार, व्यवहार, कार्यशैली अथवा शिक्षक हितों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को देखकर अपना निर्णय ले सकते हैं। उनके निर्णय से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन केवल चुनाव परिणाम के आधार पर उनकी निष्ठा पर संदेह करना उचित नहीं है।
निर्दलीय प्रत्याशी की जीत का संदेश:
यदि शिक्षकों ने स्थापित राजनीतिक समीकरणों से अलग किसी निर्दलीय प्रत्याशी पर भरोसा जताया है, तो इस जनादेश को समझने की जरूरत है। निर्दलीय होना किसी प्रत्याशी की कमजोरी नहीं है, ठीक उसी तरह जैसे किसी राजनीतिक दल से जुड़ाव अपने आप में योग्यता की गारंटी नहीं है। चुनाव परिणाम यह संकेत दे सकते हैं कि मतदाता अपनी समस्याओं, अपेक्षाओं और प्राथमिकताओं के आधार पर स्वतंत्र निर्णय ले रहे हैं। इसलिए किसी प्रत्याशी की जीत को केवल राजनीतिक समीकरणों के चश्मे से देखने के बजाय मतदाताओं की पसंद और उसके पीछे के संभावित कारणों को समझना चाहिए।
पराजय के बाद आत्ममंथन जरूरी:
चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिलने पर प्रत्याशियों और उनके समर्थकों को आत्ममंथन करना चाहिए। यह विचार करना चाहिए कि शिक्षकों की समस्याओं को कितनी गंभीरता से उठाया गया, उनके साथ संवाद कितना प्रभावी रहा और उनके बीच विश्वास का रिश्ता कितना मजबूत बन पाया। पराजय के कारणों की समीक्षा भविष्य की राजनीति को बेहतर बना सकती है। इसके विपरीत, बिना प्रमाण के आरोप लगाने से न तो हार के कारण स्पष्ट होंगे और न ही जनता का विश्वास हासिल किया जा सकेगा।
मतदाता किसी की राजनीतिक संपत्ति नहीं:
सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का परिणाम एक बार फिर यह याद दिलाता है कि मतदाता किसी राजनीतिक दल, प्रत्याशी या प्रभावशाली व्यक्ति की संपत्ति नहीं होते। उनका मत उनकी स्वतंत्र इच्छा का प्रतिबिंब है। उसे स्वीकार करना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी शर्त है। चुनाव में हार- जीत राजनीति का हिस्सा है, लेकिन परिणाम के बाद भी भाषा, व्यवहार और आरोपों में मर्यादा बनाए रखना राजनीतिक परिपक्वता की पहचान है। चुनाव परिणामों की समीक्षा होनी चाहिए, सवाल भी उठने चाहिए, लेकिन किसी पूरे समुदाय की प्रतिष्ठा को बिना प्रमाण कठघरे में खड़ा नहीं किया जाना चाहिए। शिक्षकों के मत का सम्मान करना केवल एक वर्ग की गरिमा का सम्मान नहीं, बल्कि लोकतंत्र में स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार को स्वीकार करना भी है।
लेखक: कुमार मृणाभ
(शिक्षक, कवि, लेखक, अभिनेता एवं सहायक निर्देशक)

