कृषि विज्ञान केंद्र मांझी में किसानों को धान में जल प्रबंधन और खरपतवार नियंत्रण का प्रशिक्षण
सारण (बिहार) संवाददाता वीरेश सिंह: मांझी स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में गुरुवार को किसानों के लिए एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रशिक्षण में किसानों को धान की फसल में जल प्रबंधन, गीला-सूखा सिंचाई विधि, एल नीनो के संभावित प्रभाव तथा खरपतवार नियंत्रण के संबंध में वैज्ञानिक जानकारी दी गई। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के अधीन संचालित कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा आयोजित प्रशिक्षण में मांझी एवं रिविलगंज प्रखंड के करीब 40 महिला एवं पुरुष किसानों ने भाग लिया।
गीला-सूखा विधि से पानी की होगी बचत
प्रशिक्षण के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र की विषय वस्तु विशेषज्ञ (कृषि अभियंत्रण) डॉ. सुषमा टम्टा ने किसानों को धान में गीला-सूखा विधि के वैज्ञानिक महत्व और व्यावहारिक उपयोग की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि वर्षा की अनिश्चितता और बदलते मौसम के दौर में खेत में हर समय पानी भरा रखना आवश्यक नहीं है। फसल की आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करने से जल की बचत के साथ उत्पादन लागत को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
उन्होंने किसानों को खेत में पानी के स्तर की निगरानी करते हुए आवश्यकता के अनुरूप सिंचाई करने की सलाह दी। इससे उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है।
एल नीनो से वर्षा और सिंचाई व्यवस्था पर पड़ सकता है असर
प्रशिक्षण के दूसरे सत्र में एल नीनो एवं उसके कृषि पर संभावित प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने बताया कि एल नीनो जैसी जलवायु घटनाओं के कारण वर्षा के वितरण में असमानता और तापमान में वृद्धि की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इससे सूखे की संभावना, वर्षा की अनिश्चितता तथा सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
विशेषज्ञों ने किसानों को ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए जल संरक्षण, उचित सिंचाई प्रबंधन और मौसम आधारित कृषि तकनीकों को अपनाने की सलाह दी। किसानों से उपलब्ध जल संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने और मौसम के पूर्वानुमान के आधार पर कृषि कार्यों की योजना बनाने का आग्रह किया गया।
गाजर घास से मानव और पशु स्वास्थ्य को खतरा
कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के विषय वस्तु विशेषज्ञ (उद्यान) डॉ. जितेंद्र चंद्र चंदोला ने किसानों को गाजर घास के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक किया। उन्होंने बताया कि गाजर घास तेजी से फैलने वाला खरपतवार है, जो मानव एवं पशु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। इसके संपर्क में आने से चर्म रोग और एलर्जी जैसी समस्याएं हो सकती हैं तथा पशुओं के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
डॉ. चंदोला ने किसानों को गाजर घास की पहचान, समय रहते इसके नियंत्रण तथा इसके प्रसार को रोकने के उपायों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस खरपतवार के प्रभावी नियंत्रण के लिए सामूहिक स्तर पर प्रयास जरूरी है।
किसानों की जिज्ञासाओं का विशेषज्ञों ने दिया समाधान
प्रशिक्षण के दौरान किसानों ने धान में जल प्रबंधन, सिंचाई की उचित विधि, मौसम परिवर्तन, एल नीनो और खरपतवार नियंत्रण से संबंधित कई सवाल पूछे। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों की जिज्ञासाओं का वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक समाधान बताया।
कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा आयोजित इस प्रशिक्षण का उद्देश्य किसानों को बदलते मौसम एवं जल संकट की संभावित परिस्थितियों के अनुरूप वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए जागरूक करना तथा खेती की लागत कम करते हुए संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए प्रेरित करना रहा।
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