डॉ. कृष्ण चतुर्वेदी - हाड़ौती की साहित्य शक्ति
शब्दों से रचा वृंदावन
इश्क और ज्ञान दोनों को साध लेने का नाम ही कृष्ण चतुर्वेदी है।
/// जगत दर्शन न्यूज
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हाड़ौती की काली माटी, बूंदी के किलों और चंबल की लहरों के बीच पली-बढ़ी साहित्य साधना का नाम है - डॉ. कृष्ण चतुर्वेदी। कवि-समीक्षक, लेखक और संपादक के बाद भी और न जाने कितने रूपों में आपकी प्रतिभा है। देश के तमाम प्रतिष्ठित हिन्दी अखबारों, साहित्यिक पत्रिकाओं और डिजिटल मंचों पर छपने वाली रचनाएं, संपादित पुस्तकें आज हाड़ौती की साहित्य शक्ति का पर्याय बन चुकी हैं।
311 शब्दों में वृंदावन की प्रेम कथा। जहाँ हर दोहा एक नया रहस्य खोलता है। एक ऐसी दुनिया जहाँ प्रेम ही सबसे बड़ा तप है, और हर भक्त उस प्रेम में मुक्ति पाता है"_।
दोहे इसी कथा के अंश हैं:
_मन वृंदावन में रमा, महिमा कही अनंत।
कान्हा लीला धाम में, प्रकटे ज्ञानी संत।_
_कान्हा तो हँसता रहे, पकड़ प्रेम की डोर।
राधे रस की गागरी, जिसका ओर न छोर।_
सजनी सजती शाम" - लोक जीवन के दस्तावेज
_सो नर सोना सोहता, सजनी सजती शाम।
बांह गहे गलफांस-सी, मत लो उसका नाम।_
_बीवी हो जो मायके, खूब रहे फिर मौज।
सिर चढ़ती है बैटती, यहाँ रहे तो रोज़।_
_सुख सागर-सी डोलती, एक पड़ौसन नेक।
जगह-जगह है प्यार के, किस्से यहाँ अनेक।_
लोक व्यवहार, रिश्ते, कर्मफल - सब दोहे में बंध गया।
कुण्डलिया छंद - कर्म और भाग्य का दर्शन
आगे-पीछे डोलती, बस में आती नाहिं।
बिगड़ गई ये कुंडली, ढूंढे विधि की छाहिं।
सुन 'चौबे' कवि आज, मात्रा गिन ले अभागे।
यही करम की रेख, चलेगी तेरे आगे।_
कार्य करो भरपूर
_धन-दौलत को देखके, जो ना बदले राह।
सबकी अपनी सोच है, सबकी अपनी चाह।
यही समय की सीख, प्रसन्न रखो अपना मन।
कार्य करो भरपूर, तभी तो आएगा धन।_
कर्म की महत्ता और संतोष का पाठ - यही आपकी कुण्डलिया का मूल है।
तुम तो तीरे-नजर के शिकार हो गये हो
सुना है आजकल कविताएँ लिखने लगे हो,
तुम देश के बड़े कलमकार हो गये हो।
काम बहुत बाकी यहाँ, आ ना जाए मौत।
उलझ गये हम जिंदगी, जनमें है उद्योत।
"कान्हा तो हँसता रहे, पकड़ प्रेम की डोर" - आपने राधा-कृष्ण के प्रेम को दोहे में अमर कर दिया।
हाड़ौती गर्व से कहती है - हमारे कृष्ण चतुर्वेदी ने शब्दों से वृंदावन रच दिया। आपकी कलम यूँ ही "राधे रस की गागरी" बरसाती रहे।
रुबाई छंद में मधुशाला का जादू
डॉ. कृष्ण चतुर्वेदी छंदों के सिद्ध साधक हैं। 'रुबाई छंद' में उनकी कलम मादकता और दर्शन का संगम रचती है:
रुबाई छंद
थोड़ा-थोड़ा कौन पिएं अब,
होश गंवाना है बाकी।
मधुशाला तो खुली पड़ी है,
जुल्फें बिखरा दे साकी॥
मैं कविता का प्याला लेकर,
झूम रहा मतवालों-सा।
भर-भर देती साकी बाला,
सुर्ख हुए उन गालों-सा॥
"नेह नयन में भरो न साकी, रहे न खाली ये प्याला। मादक मस्त जवानी चाहे, तन से उठ जाए ज्वाला" - ये पंक्तियाँ शृंगार और अध्यात्म को एक साथ छूती हैं।
दोहा और विनय उजाला - प्रेम vs ज्ञान का द्वंद्व
'विनय उजाला में' लिखे उनके दोहे आज के रिश्तों और जीवन दर्शन का आईना हैं:
दोहे
कागज़ पर लिखता रहूँ, वहीं छलकता प्यार।
सांझा ही हमने किया, हरदम कारोबार।
थोड़ी-सी तकरार है, थोड़ा-सा है प्यार॥
दिल में बैठी शायरी, दर्द करे बेजार।
कागज़ पर लिखता रहूँ, वहीं छलकता प्यार॥
काम बहुत बाकी यहाँ, आ न जाए मौत।
उलझ गये हम जिंदगी, जन्में है उद्योत॥
कवियों ने गाया सदा, हुए तपी हैरान।
पार नहीं पाया सखे, इश्क बड़ा या ज्ञान॥
उद्धव मत बनना यहाँ, ज्ञान बनेगा भार।
प्रीत पड़ी है गोपियाँ, तुम जाओगे हार॥
"इश्क बड़ा या ज्ञान" - ये सवाल सदियों से चला आ रहा है, और डॉ. साहब का जवाब दोहे में उतर आया है।
कविता का देश - प्रकृति और प्रेम का संगम
ये कविता का देश है,
........मेरे लिए विशेष।
दोहों में बिखरें यहाँ,
........तेरे सुंदर केश॥
- कृष्ण चतुर्वेदी
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बरखां-बादल-बीजळी, कब लाओगे संग।
उमस उठी इस प्यार से, जलते है सब अंग॥
*'माँ' पर घनाक्षरी - करुणा की मूर्ति*
'माँ' विषय पर लिखी घनाक्षरी छंद में मातृ प्रेम साकार हो उठता है:
माँ' पर घनाक्षरी
देव खेलने जो आए, भर अंक इतराए।
कान्हा जैसे लीलाधारी, यशोदा-सी मात है॥
जीव देह में उतार, सहती है सब भार।
करुणा से भरी मात, तारों भरी रात है॥
घर आँगन सजाए, दीया देहरी जलाए,
वेदों का है सार माता, मन भरा भात है॥
छोड़ देह माँ सिधारी, अब मन हुआ भारी,
ऐसा लगे विधाता का, जैसे हुआ घात है॥
"वेदों का है सार माता" - माँ को वेदों का सार बता देना, यही हाड़ौती की संस्कृति है।
उसने यह पाठ पढ़ाया' - तुलसी से प्रेरणा
अखबार में छपी उनकी कविता तुलसीदास के जीवन से सीख देती है:
नाम धरा अधरों पर तो समझो जग में वह नाम कमाया।
जन्म हुआ तब माँ हुलसी पर वो तुलसी फिर दास कहाया।
प्रेम मिला तो प्रीति बढ़ी उससे उसने यह पाठ पढ़ाया।
जान सुजान मुझे पर ज्ञान नहीं कुछ काम यहाँ पर आया।
साहित्य सेवा और संपादन - हाड़ौती का नाम रोशन
डॉ. कृष्ण चतुर्वेदी सिर्फ कवि ही नहीं, साहित्य के प्रहरी भी हैं। पत्रिका के संपादक के रूप में वो नीदरलैंड से डॉ. ऋतु शर्मा की रिपोर्ट प्रकाशित कर रहे हैं। 'मिलिए इनसे.....प्रवासी साहित्यकार (प्रो.) डॉ. ऋतु शर्मा, नीदरलैंड से!' लेख में वो फर्स्ट एडिटर के रूप में छपे हैं।
'वाइस ऑफ मुसाफिर' के उद्भ्रांत के महाकाव्यों पर भारत के विश्वविद्यालयों में शोध चल रहे हैं - ये जानकारी वो पाठकों तक पहुंचा रहे हैं।
उपसंहार: शब्दों से रचा वृंदावन
बूंदी, राजस्थान के रहने वाले कृष्ण चतुर्वेदी ने साबित किया कि रुबाई की मादकता हो, दोहे का दर्शन हो, घनाक्षरी की करुणा हो या कविता का लोक संदेश - हर विधा में उनकी कलम सिद्ध है।
"कवियों ने गाया सदा, हुए तपी हैरान। पार नहीं पाया सखे, इश्क बड़ा या ज्ञान" - शायद डॉ. साहब खुद इस सवाल का जवाब अपनी कलम से दे रहे हैं। *इश्क भी और ज्ञान भी - दोनों को साध लेना ही कृष्ण चतुर्वेदी हैं।*
हाड़ौती को गर्व है अपने इस बेटे पर जिसने शब्दों से वृंदावन रच दिया और कर्म से सेवा का आदर्श। उनकी कलम यूँ ही हाड़ौती की साहित्य शक्ति बनकर चमकती रहे।

